मैं नरेन्द्र दामोदरदास मोदी…

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‘नरेन्द्र मोदी’ एक ऐसा नाम जिसे आज हर कोई बड़े गर्व और आशा के साथ लेता है। पूरे विश्व मे भारत की एक नई पहचान देने बाले भारत के 15वें प्रधानमंत्री जो शायद एक नया भारत का एतिहास लिखने बाले है। आज ये नाम “मोदी” – भारत मे ही परन्तु पूरे विश्व मे प्रसिद्ध है, लाखों ओर करोड़ों प्रसंशक हैं जिनके। नरेन्द्र मोदी भारत  के एतिहास के सब  से ज़्यादा चर्चित प्रधानमंत्री मे से है और पूरे विश्व  की निगाहें उन पर टिकी हुई हैं। मोदी जी एक कुशल प्रशासक, कुशल राजनीतिज्ञ, कुशल प्रवक्ता और  सुलझे हुए व्यक्तित्व  बाले इंसान हैं। श्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह वे एक राजनेता के साथ कवि भी हैं। उन्होंने गुजराती भाषा के अलावा हिन्दी में भी देशप्रेम से भारी कविताएँ लिखी हैं। परन्तु उनका जीवन इतना सरल नही रहा और उसको समझना  भी इतना सरल भी नहीं है। उनके जीवन  मे बहुत से उतार चढ़ाव आए और गए पर वे सदा ही उन परिस्थितियों के साथ लड़ते रहे और  आज भी वेसा ही व्यक्तित्व है उनका। ये ही कारण है कि आज बच्चा बच्चा ‘मोदी-मोदी’  कहता है क्यूँ कि हर कोई उनकी ओर आशा भारी निगाहों से देख रहा है की कुछ नया होगा, कुछ देश बदलेगा और अच्छे दिन आएँगे।

रोचक बात ये है की नरेन्द्र मोदी स्वतन्त्र भारत के 15वें प्रधानमन्त्री हैं तथा इस पद पर आसीन होने वाले स्वतंत्र भारत में जन्मे प्रथम व्यक्ति हैं।

नरेन्द्र दामोदर दास मोदी का जन्म 17 सितम्बर 1950 को गुजरात के वडनगर मेहशाना जिले के एक गरीब परिवार में हुआ था। नरेन्द्र मोदी जी के पिता का नाम श्री दामोदर मूलचंद मोदी जी  और माता का नाम श्रीमती हीराबेन मोदी जी है। नरेन्द्र मोदी जी के चार भाई श्री सोमा मोदी, श्री प्रहलाद मोदी, श्री पंकज मोदी और एक स्वयं श्री नरेन्द्र मोदी और दो बहनें बहन श्रीमती अमरुत व श्रीमती बसंती हैं। मोदी जी की प्रारंभिक शिक्षा वडनगर गुजरात से हुयी, जहाँ उन्होंने 1967 में अपना हाई स्कूल पास किया । उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय- डिस्टेंस एजूकेशन लेकर राजनीती विज्ञानं में  डिग्री प्राप्त की और उसके बाद 1978 में गुजरात विश्वविद्यालय से पॉलिटिकल साइंस में  मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री प्राप्त की।

श्री दामोदर मूलचंद मोदी और श्रीमती हीराबेन मोदी दम्पति के घर में 17 सितम्बर 1950 जन्मे नरेन्द्र मोदी जी का जन्म वडनगर मेहशाना,गुजरात में हुआ। उनकी शुरवाती पढाई नरेन्द्र मोदी जी ने वडनगर में ही हुई। एक बार नरेन्द्र मोदी ने कहा था की भले ही वे अपनी कक्षा में अव्वल ना आये हो मगर पढने का उन्हें बहुत शौक था। परन्तु उनको जानने वाले बताते हैं कि  वे एक अच्छे वक्ता और अपनी बात को दमदारी से पेश करने का हुनर उनमे बचपन से ही भरा हुआ है । सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि वे बताते हैं कि नरेन्द्र मोदी जी अपने स्कूल में होने वाले कार्यक्रम में भी बढ़ चदकर हिस्सा लेते थे और इसी बात पर उनके अध्यापक उनसे बहुत खुश भी रहते थे । बचपन में वे अपने पिता के साथ रेलवे स्टेशन पर चाय का स्टाल लगाते थे वे छुट्टि होने के बाद वे अपने पिताजी के साथ चाय के स्टाल में लग जाते थे और पिताजी के काम काज को सरल करने में अपना हाथ बताया करते थे। नरेन्द्र मोदी जी की सगाई 13 वर्ष की आयु में जसोदा बेन चमनलाल के साथ कर दी गयी और जब वह मात्र 17 वर्ष के थे उनका विवाह हुआ। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार नरेन्द्र मोदी और  जसोदा बेन चमनलाल ने कुछ वर्ष साथ रहकर बिताये परन्तु कुछ समय बाद वे दोनों अलग हो गए और एक दूसरे के लिये अजनबी हो गये क्योंकि नरेन्द्र मोदी ने उनसे कुछ ऐसी ही इच्छा व्यक्त की थी। जबकि नरेन्द्र मोदी के जीवनी लेखक ऐसा नहीं मानते उनका कहना है की उन दोनों की शादी हुई जरूर थी परन्तु वे दोनों एक साथ कभी नहीं रहे। शादी के कुछ बरसों बाद नरेन्द्र मोदी ने घर त्याग दिया और एक प्रकार से उनका वैवाहिक जीवन लगभग समाप्त-सा ही हो गया। आज भी नरेन्द्र मोदी और जसोदा बेन चमनलाल अलग अलग रहते है जानकर कहते है की बे कई सालों से मिले भी नहीं।

नरेन्द्र मोदी पर स्वामी विवेकानंद की बातो का इतना असर हुआ था की उन्होंने 1970 में  घर-बार छोड़कर हिमालय की तरफ सन्यासी बनने के मकसद से रुख किया ,और इस दौरान उन्होंने बहुत से धार्मिक जगहों जैसे उत्तराखंड में ऋषीकेश, बंगाल में रामकृष्ण आश्रम और पूर्वोत्तर भारत की कई जगहों का भ्रमण भी किया। ये वो ही समय था जब उनको  अध्यात्म जीवन, जीवन का सारा रस, सारा ममत्व और राष्ट्र भक्ति की और गहराई से जानने का मौका मिला और इस भ्रमण के दौरान मोदी जी जीवन का मतलब और देश भक्ति से अच्छी तरह रूबरू हो चुके थे और उनमें बहुत सारा  परिवर्तन आ चुका था।

1972 को जब नरेंद्र मोदी घर लौटे तो उनमें परिवर्तन साफ झलक रहा था और वे घर पर सिर्फ दो हफ्ते के लिए रुके और अपने नए सफर के लिए निकल पड़े शायद उस समाया उनको ये मालूम नहीं था की ये रास्ता उसको किन ऊंचाइयों पर ले जायेगा। उनके मन में देशप्रेम की एक लो तो जग चुकी थी और बे घर से सीधे अहमदाबाद जा कर आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ) में शामिल हो गए जहाँ से उनका राजनीती का जीवन शुरू हुआ। मोदी का जीवन संघ के एक निष्ठावान प्रचारक के रूप में प्रारम्भ हुआ। 1975 में जब इंदिरा गाँधी ने आपातकाल की घोषणा की और जनसंघ पर भी संघ के साथ प्रतिबंध लगा दिया तब भी मोदी संघ के बंद होने के बावजूद भी देश की सेवा करते रहते थे। मोदी तब भी सरकार की उन सब नीतियों का विरोध करते रहे जो गलत थी और सभी रैलियों में साथ साथ चलते रहे। जब आपातकाल की स्थिति ख़तम हुई तो जनसंघ  और  जनता पार्टी के साथ मिल गया और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में संघ और दूसरी राजनिक दलों के साथ मिल कर सरकार बनाई। मोदी एक मेहनती और सेवा भाव रखने बाले व्यक्ति थे और इसी के फलसवरूप मोदी जी को धीरे धीरे संघ में महत्व बढ़ाता चला गया। जब 1975 के बाद से धीरे-धीरे इस संगठन का राजनीतिक महत्व बढ़ता गया और इसकी परिणाम सवरूप भाजपा (भारतीय जनता पार्टी)  जैसे राजनीतिक दल का जनम हुआ। नरेंद्र मोदी के इस योगदान को और देश के प्रति समर्पण को देखकर नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर लिया गया और यहाँ से शुरू हुआ उनका राजनैतिक जीवन जो उतार चढ़ाव से भरा रहा। उन्होंने शुरुआती जीवन से ही राजनीतिक सक्रियता दिखलायी साथ साथ में भारतीय जनता पार्टी का जनाधार मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभायी। गुजरात में शंकरसिंह वाघेला का जनाधार मजबूत बनाने में नरेन्द्र मोदी का प्रमुख भूमिका थी। नरेंदर मोदी उस समय भारतीय जनता पार्टी और संघ को मजबूत करने में मुख्या भूमिका निभा रहे थे। 1990 में नरेन्द्र मोदी ने आडवाणी की भव्य रथ यात्रा का आयोजन कुशलता पूर्वक किया और एक कुशल ऐंव प्रभाबी राजनीतिज्ञ का परिचय दिया।  इसी तरह उन्होंने बाद में मुरली मनोहर जोशी जी की भव्य यात्रा का आयोजन सफलतापूर्वक करवाया जिससे प्रभावित हो कर बीजेपी ने उनको पार्टी शामिल कर के उनको केन्द्रीय मन्त्री का दायित्व सौंपा गया। 1998 में उन्हें पदोन्नत करके राष्ट्रीय महामन्त्री (संगठन) की पदोन्नति दी गयी और बे 2001 तक इस पद पर रहे।

2001 में गुजरात में जो भूकम आया उस वक़्त पटेल लोगो को सही से राहत नहीं पंहुचा पाए और गुजरात की जनता गुजरात सरकार से नाखुश हो गयी साथ में ही गुजरात के मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल की सेहत बिगड़ने लगी। ये सब दखते हुए बीजेपी ने 2001 में केशुभाई को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया और 3 अक्टूबर 2001 को  नरेन्द्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री की कमान सौंप दी। हालांकि भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी, मोदी के सरकार चलाने के अनुभव की कमी के कारण चिंतित थे। मोदी ने पटेल के उप मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव ठुकरा दिया और आडवाणी व अटल बिहारी वाजपेयी से बोले कि यदि गुजरात की जिम्मेदारी देनी है तो पूरी दें अन्यथा न दें।

मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने पर भाजपा के सभी नेता खुश नहीं थे। कुछ दबे दबे शब्दों में उनके बिरुद्ध में थे परन्तु नरेंदर मोदी जैसी शक्शियत ऐसा मौका हाथ से कहाँ गबाना चाहती थी और वे गुजरात का ऐसे मुख्यमंत्री बने जिन्हे आने वाले समय में भी याद किया जायेगा। उनकी कई महत्वपूर्ण योजनाएँ प्रारम्भ कीं जैसे की :

पंचामृत योजना – राज्य के एकीकृत विकास की पंचायामी योजना,

कृषि महोत्सव – उपजाऊ भूमि के लिये शोध प्रयोगशालाएँ

सुजलाम् सुफलाम् – राज्य में जलस्रोतों का उचित व समेकित उपयोग, जिससे जल की बर्बादी को रोका जा सके

बेटी बचाओ – भ्रूण-हत्या व लिंगानुपात पर अंकुश हेतु

चिरंजीवी योजना – नवजात शिशु की मृत्युदर में कमी लाने हेतु

मातृ-वन्दना – जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु

ज्योतिग्राम योजना – प्रत्येक गाँव में बिजली पहुँचाने हेतु

कर्मयोगी अभियान – सरकारी कर्मचारियों में अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा जगाने हेतु

कन्या कलावाणी योजना – महिला साक्षरता व शिक्षा के प्रति जागरुकता

बालभोग योजना – निर्धन छात्रों को विद्यालय में दोपहर का भोजन

इसके इलाबा उपरोक्त विकास योजनाओं के अतिरिक्त मोदी ने आदिवासी व वनवासी क्षेत्र के विकास हेतु गुजरात राज्य में वनबन्धु विकास हेतु एक अन्य दस सूत्री कार्यक्रम भी चलाया था।

नरेंदर मोदी का जीवन में सब अच्छा ही नहीं रहा और न ही उनके मुख्यामंत्री के कार्यकाल में। फ़रवरी 2002 को अयोध्या से गुजरात वापस लौट कर आ रहे कारसेवकों को गोधरा स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में एक हिंसक भीड़ द्वारा आग लगा कर जिन्दा जला दिया गया। इस हादसे में 59 कारसेवक मारे गये थे। रोंगटे खड़े कर देने वाली इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप समूचे गुजरात में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे।

गुजरात के दंगे में मुसलमानों नरसंहार नहीं हुआ था बल्कि हिंदू-मुसलमान दोनों मारे गए थे। गोधरा में कांग्रेसी नेताओं और कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा साबरमती एक्‍सप्रेस में 59 कार सेवकों को जिंदा जलाने के बाद अहमदाबाद और गुजरात के अन्‍य हिस्‍से में जो दंगा और संप्रदायिक हिंसा भड़की थी, उसमें हिंदू-मुसलमान दोनों जले थे। नरेंद्र मोदी को किसी राजनेता या जनप्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि एक दुश्‍मन के रूप में लेने वाली इस कांग्रेस चालित यूपीए सरकार ने 11 मई 2005 में संसद के अंदर अपने लिखित जवाब में बताया था कि 2002 के दंगे में 1044 लोगों की मौत हुई थी, जिसमें से 790 मुसलमान और 254 हिंदू थे।

इसके लिये न्यूयॉर्क टाइम्स ने मोदी और उनके प्रशासन को जिम्मेवार ठहराया। मोदी पर आरोप लगे कि वे दंगों को रोक नहीं पाए और उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं किया। जब भारतीय जनता पार्टी में उन्हें पद से हटाने की बात उठी तो उन्हें तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और उनके खेमे की ओर से समर्थन मिला और वे पद पर बने रहे। कांग्रेस और सभी अनेक विपक्षी दलों ने नरेन्द्र मोदी के इस्तीफे की माँग की और मोदी ने गुजरात की दसवीं विधानसभा भंग करते हुए राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सौंप दिया और पूरे प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। राज्य में दोबारा चुनाव हुए और जिस के परिणाम बहुत चौकाने बाले थे भारतीय जनता पार्टी ने मोदी के नेतृत्व में विधान सभा की कुल 182 सीटों में से १२७ सीटों पर जीत हासिल की। मोदी पर आरोप लगते रहे लेकिन राज्य की राजनीति पर उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई।  मोदी के खिलाफ दंगों से संबंधित कोई आरोप किसी कोर्ट में सिद्ध नहीं हुए हैं।  हालांकि आज तक खुद मोदी ने कभी भी दंगों को लेकर न तो कोई अफसोस जताया और न कुछ बोला। नरेन्द्र मोदी ने अपने मुख्यमंत्री पद बार सराहनीय काम किया और गुजरात को चौमुखी विकास किया जिसका परिणाम यह हुआ की गुजरात की जनता ने नरेन्द्र मोदी को लगातार चार बार गुजरात का मुख्यमंत्री चुना और उन्हें भारत के सबसे अच्छे मुख्यमंत्रियों की सूचि में शामिल करवा दिया।

13 सितम्बर 2013 को हुई भाजपा की संसदीय बोर्ड की बैठक में नरेंद्र मोदी को 2014 के प्रधानमंत्री  पद के उम्मीदवार के लिए घोषित कर दिया गया परन्तु उनका नाम प्रधानमंत्री  पद के लिए घोषित करना इतना आसान नहीं था। पूरी भाजपा में खलबली मच गई क्योंकी कुछ उनके साथ थे और कुछ उनके विरुद्ध, साथ में उनको भाजपा की सहयोगी पार्टियों का भी विरोध सहना पड़ा। परन्तु अंत में भाजपा की संसदीय बोर्ड नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया और जोरो शोरो से चुनाव प्रचार होने लग गए।  मोदी ने पूरे भारत में अनेक रैलियाँ की जिनमें हज़ारों लोग उन्हें सुनने आते थे । मोदी ने सोशल मीडिया का भी भरपूर लाभ उठाया और लाखों लोगों तक अपनी बात रखी । अब एक तो मोदी ने लगातार चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री बनकर अपनी ख्याति पुरे देश में बना ली थी और साथ ही उनके भाषण इतने आकर्षक होते थे कि 2014 में चुनाव के पहले ही कुछ लोगो ने उन्हें प्रधानमंत्री मान लिया था और आखिरकार जिस मंजिल के लिए मोदी ने अपना कारवां शुरू किया था वो  मंजिल उनको हासिल हो ही गयी।

मोदी के गुजरात में विकासशील कार्य, उनके प्रेरणादायक भाषण, देश के प्रति उनका प्यार, उनकी साधारण शुरुआत और उनकी सकारात्मक सोच के कारण उन्हें भारी मात्रा में वोट मिले। पुरे देश में मोदी लहार चल पड़ी थी जो आज तक कायम है। वे भारत के पंद्रहवे प्रधानमंत्री बने नतीजा यह हुआ कि चुनाव परिणाम में उन्होंने 280 सीटें जीतकर एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक जीत  हासिल की। 6 मई 2014 को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें प्रधान मंत्री पद की शपथ दिलाई और उन्होंने संसद में प्रवेश करने से पहले संसद में नतमस्तक होकर भारत के 15वे प्रधानमंत्री का पद भार संभाला।

नरेंद्र मोदी देशभर में एक नई उम्मीद बन कर उभरे है। देशवासी आज उनके साथ खड़े है क्यूंकि वे उनसे विकास, उन्नति और सकारात्मक सोच की उम्मीद करते है जिस से देश आगे बड़े और पूरी दुनिया में राज करे। नरेंद्र मोदी को देश के हर कोने से लोगों का समर्थन मिला है चाहे लोक सभा चुनाव हो या राज्य सभा।

नरेंद्र मोदी जी ने देश के हित के लिए बहुत सारी योजनाए लागू की हैं और नोटबंदी जैसे बड़े फैलसे लिए देखा जाये तो नोटबंदी जैसे फैसला आसान नहीं था।  इस फैसले से उनकी कुर्सी भी जा सकती थी परन्तु देशवासी उनके साथ खड़े थे।  सबको कुछ दिन परेशानियों का सामना करना पड़ा लेकिन धीरे धीरे सब हालात सामान्य हो गए।

जीएसटी (GST) लागु करने का फैसला भी भारत के इतिहास का एक बड़ा फैसला माना गया है। नरेंद्र मोदी जी की सकारात्मक सोच के साथ देशवासी भी चलने लगे है हर कोई उनको उम्मीद की नजर से देखता है और उनमे अपनेआप को ढूंढ़ता है।

इन सबका देश की अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ेगा ये तो आने बाले दिन ही बतायेगे परतुं देशवासी नरेंद्र मोदी जी के साथ थे और हैं ये सबने उनको बता दिया। नरेन्द्र मोदी ने भी देश की जनता को यह विश्वास दिलाया कि उन्हें आज जो दायित्व सौंपा गया है उसे वह पूरी निष्ठा और परिश्रम की पराकाष्ठा से निभायेंगे।

“मैं प्रधानमंत्री के रूप में नहीं प्रधानसेवक के रूप में आपके बीच उपस्थित हूँ” – नरेन्द्र मोदी

 

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